दशहरा

 आज युद्ध है नारायण और रावण के बीच

देखो बीच में कोई ना आये
फिर ना कहना आके बीच में, हम बहुत ही पछताये

एक तीन लोकों का विधाता
एक सब वेदों का ज्ञाता

एक वीर जिस्के आगे, देव अपना शीश झुकाते
एक वीर जिससे सब देव, देखो कैसे थर  थर कांपे।

एक पत्नी की आन के लिए
एक बहन के मान के लिए
और अपने अभिमान के लिए

आज सम्मुख है एक दूजे के
एक दूजे की जान के लिए

अंततः कौन होगा विजयी, ये दोनो को ज्ञात है
पर अब पीछे हटाना, नामुमकिन बात है।

इस युद्ध में राम तनिक है विचलाते
रावण के एक शीश के कटने पर,
दूजे शीश हैं कहां से आते

देख राम की इस उलझन को
आये विभीषण ले कर उपचार
रावण के नाभि में अमृत
प्रभु वहि पर करेन प्रहार

तीर चलाया राम ने बना नाभी को आधार
हो गया अंततः रावण का देखो संहार

रावण भांति कई शीश,
अब भी इस संसार में
वानर भांति पुरुष यहाँ
हैं किसी राम के इंतजार में

हर वर्ष जला पुतला रावण का
देखो कितने हर्षाते
और अगले दिन फिर अपने को
जहां थे वहां पर हैं पाते

कई राम अब भी उसी उलझन में
तलाश रहे विभीषण को
जो उनको रावण का राज बतायें
नाभि की रावण का, उनको थोड़ा ज्ञात करायें।

जय श्री राम।

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